October 31st 2022

इस मक़ाम पर ।

क्या कुछ नहीं किया ज़िन्दगी ने इस मक़ाम पर,
पहुँचे तो पहुँचे भी कुछ देर से इस मक़ाम पर।

मुमकिन से नामुमकिनको बदलना भी चाहा था,
सोच भी थी, यहीं कभी, आयेंगे इस मक़ाम पर।

जीना यहाँ, मरना यहाँ, सुना जब दिल से दिल लगा,
ये भी सुनेंगे, जी ते जी मरते रहें इस मक़ाम पर।

सागर नहीं, सुराही नहीं, साक़ी नहीं तो क्या-
फिर भी नशे में लड़खड़ाते रहे इस मक़ाम पर।

सभी ने कहा, ना दिल मानता, ना हम भी मानते,
भूल गए सच-जूठ की सब परखें इस मक़ाम पर॥

यारों कभी, ऐसा भी कुछ होता रहा ज़िंदगी में –
ख़ुद को सुना, ग़ैर की आवाज़ में इस मक़ाम पर।

ये वादियाँ थी, चाहतोमें बस रहे चित्कारकी-
शिकवे कभी, रुसवे कभी, सिसके इस मक़ाम पर॥

ना इलाज है, ना उपाय है, ये कहाँ पे आ गए है हम,
बिखरे हुए, सांसों के सपने उजड़े इस मक़ाम पर ॥

क्या खो दिया, क्या पा लिया ये समझ आ जाती-
लेकिन ‘मनुज’ फिरते रहे उलझे से इस मक़ाम पर ॥

‘मनुज’ ह्युस्तोनवी
१०/३१/२०२२

February 27th 2020

परवरदिगार!

अपनी किस्मत से मांगा जो पाया नहीं।
हाथ हजारों है पर कुछ दे पाया नहीं।

पहले तू मुझमें ही बीलकुल रेहता था,
अब मेरी तू छडी नहीं, हम साया नहीं ।

धागों से बांधे फूलों के ठिक पीछे से,
तुझको साफ नज़र कुछ भी आता नहीं।

सजदे ऐसे उठानेकी आदत क्या हूई,
बनके पत्थर बैठा तू ऊठ पाता नहीं।

गलती किसकी है, माफी मिलेगी नहीं,
मैं तेरे दर पे, तू मेरे दर आया नहीं।

कुछ सुना था कभी कोई कथाओं में,
तू ऐसा कि तेरा कहीं कोई साया नहीं।

मन्नतें मांग कर, फूल हाथों में लिये,
राह देखी बहुत पर तू आया नहीं।

डोली कांधों पे थी, पर मना कर दीया,
फिर ना केहना तुम्हें कोई लाया नहीं।

तोडे इतने है दील तुने, मेरे खुदा-
शहर में कोई खाली मयखाना नहीं।

साथ आये है, साथ ही है, फिर भी क्युं?
अपनों की मेह्फिल में अपना सा नही।

तेरी नज़र ने हम को ऐसे बांधा है ,
अब मै अपनी नज़र से देख पाता नहीं

धागों ताविजों के उलझे ये चक्कर में,
बंधा क्या ‘मनुज’ बस खुल पाता नहीं।

क्या ‘मनुज’ ये सीला खत्म होगा कभी?
जाम खाली कोई अब छलकाता नहीं।

‘मनुज’ ह्युस्तोनवी
०४/१७/२०१७